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एसएएफ की 14 वीं बहिनी में खुशनुमा और स्वस्थ्य जीवन शैली विषय पर कार्यक्रम आयोजित

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26.08.2025

सकारात्मक सोच इंसान को हर कठिन परिस्थिति में हिम्मत देती है – बीके प्रहलाद भाई

ग्वालियर। एसएएफ 14वीं वाहिनी विशेष सशस्त्र पुलिस बल द्वारा “पॉजिटिव थिंकिंग, हैप्पी एंड हेल्दी लिविंग” (सकारात्मक सोच, खुशनुमा और स्वस्थ्य जीवनशैली) विषय पर कार्यक्रम का आयोजन बटालियन कमांडेंट डॉ शिवदयाल सिंह (आईपीएस) के निर्देशन में आयोजित हुआ।
कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय से मोटिवेशनल स्पीकर बीके प्रहलाद भाई तथा राजयोग ध्यान प्रशिक्षक बीके ज्योति बहन, बीके सुरभि बहन उपस्थित थीं। इसके साथ ही कार्यक्रम में 14 वीं वाहिनी एसएएफ के डिप्टी कमांडेंट श्री संजय कॉल, मेडिकल ऑफिसर डॉ.ओमप्रकाश वर्मा, सहायक सेनानी श्री रत्नेश तोमर, सहायक सेनानी श्री प्रमोद शाक्य, सहायक सेनानी श्री दिलीप चंद छारी, निरीक्षक श्री राकेश कुमार शर्मा आदि उपस्थित थे।
कार्यक्रम में बीके प्रहलाद भाई ने सभी को संबोधित करते हुए कहा कि हमारे मन में जैसे विचार आते है वैसा ही हमारा जीवन बनता है। यह विचार सुनने में सरल लगता है पर वास्तव में यही जीवन का सबसे बड़ा सत्य है कि मनुष्य का जीवन उसकी सोच का प्रतिबिंब होता है। अगर हमारा मन सकारात्मक विचारों से भरा रहेगा तो जीवन में हर परिस्थिति का सामना आसानी से किया जा सकता है। लेकिन यदि मन में नकारात्मक विचार आते है तो हमारे पास कितना भी धन, पद या सुविधाएँ क्यों ना हो पर हमें जीवन बोझ ही लगेगा। इसलिए जीवन में सफलता पाने के लिए केवल मेहनत करना ही काफी नहीं होता, बल्कि सही सोच और समय का सही उपयोग करना भी उतना ही आवश्यक होता है।


सकारात्मक सोच इंसान को हर कठिन परिस्थिति में हिम्मत से खड़े रहने की शक्ति देती है।
जब हम किसी भी समस्या का सामना करते हैं तो नकारत्मक विचार हमें कमजोर बना देते हैं। जबकि सकारात्मक सोच विश्वास जगाती है कि हर समय समस्या का समाधान मौजूद है यही विश्वास इंसान को मंजिल तक पहुंचाने के लिए प्रेरित करता है, ठीक उसी प्रकार समय प्रबंधन जीवन की सबसे बड़ी कला है समय बहुत कीमती है और एक बार चला गया तो वह समय कभी वापस नहीं आता। जो लोग समय क़ा सही महत्त्व समझते हैं वही जीवन में आगे बढ़ते हैं और सफलता प्राप्त करते हैं समय का सही उपयोग हमें अनुशासन, धैर्य और कार्य के प्रति जिम्मेदारी सिखाता है।
अगर हम सकारात्मक सोच के साथ समय का सम्मान करना सीख जाए तो न केवल हमारे जीवन में प्रगति होगी बल्कि हम दूसरों के लिए भी प्रेरणा बनेंगे यही दोनों बातें सकारात्मक सोच और समय प्रबंधन जीवन को सार्थक और सफल बनाती हैं। इसके साथ ही उन्होंने आगे कहा कि हम कितने भी व्यस्त क्यों न हों परंतु थोड़ा समय हमें अपने लिए निकलना चाहिए जिसमें हम तन और मन को स्वस्थ्य रखने के लिए ध्यान, योग, प्राणायाम आदि के लिए समय निकाल सकें। साथ ही थोड़ा समय हमें अपने परिवार और मित्र संबंधियों को भी देना चाहिए। इससे हमें सकारात्मक ऊर्जा मिलती है और जीवन भी हमारा खुशहाल होता है।
तत्पश्चात डिप्टी कमांडेंट ने जवानों को संबोधित करते हुए कहा कि सफलता का रास्ता आसान नहीं होता । यह कठिनाइयों, संघर्षों और असफलताओं से होकर गुजरता है लेकिन जो व्यक्ति अपने लक्ष्य और कार्य के प्रति अडिग रहता है, वही मंज़िल तक पहुँच पाता है।


डॉ ओपी वर्मा ने कहा कि एक स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मन से ही इंसान अपने जीवन के हर लक्ष्य को हासिल कर सकता है। जब स्वास्थ्य अच्छा होता है तो जीवन ऊर्जा से भर जाता है, काम में उत्साह आता है और मन खुश रहता है। लेकिन जब स्वास्थ्य बिगड़ जाता है, तो सारी खुशियाँ फीकी लगने लगती हैं।
अंत में बीके ज्योति बहन ने उपस्थित जवानों को राजयोग ध्यान के बारे में विस्तार से बताया तथा सभज को ध्यान का अभ्यास भी कराया।
इसके साथ ही सारा दिन अच्छा बीते उसके लिए रचनात्मक एक्टिविटी भी सभी को कराई और कहा कि रोज हमें सबके लिए अच्छे विचार रखने चाहिए।
इस अवसर पर अनेकानेक अधिकारी एवं एक सैकड़ा से अधिक पुलिस के जवान उपस्थित थे।

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ब्रह्माकुमारीज़ की प्रथम मुख्य प्रशासिका मातेश्वरी जगदम्बा सरस्वती (मम्मा) का 61वां पुण्य स्मृति दिवस मनाया

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ब्रह्माकुमारीज़ की प्रथम मुख्य प्रशासिका मातेश्वरी जगदम्बा सरस्वती (मम्मा) का 61वां पुण्य स्मृति दिवस मनाया

संस्थापक ब्रह्मा बाबा ने प्रथम मुख्य प्रशासिका के रूप में सौंपी थी जिम्मेदारी

ग्वालियर। प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय की प्रथम मुख्य प्रशासिका मातेश्वरी जगदम्बा सरस्वती (मम्मा) का 61वां पुण्य स्मृति दिवस गुरुवार को आध्यात्मिक ज्ञान दिवस के रूप में श्रद्धा एवं सम्मान के साथ मनाया गया। यह कार्यक्रम माधौगंज स्थित प्रभु उपहार भवन, पुराना हाईकोर्ट लाइन स्थित संगम भवन सहित ग्वालियर के सभी सेवा केंद्रों पर आयोजित किया गया।
इस अवसर पर सभी केंद्रों पर ब्रह्ममुहूर्त से लेकर देर रात्रि तक विशेष राजयोग-साधना एवं स्मृति कार्यक्रमों का आयोजन हुआ। प्रातः एवं सायंकाल आयोजित श्रद्धांजलि सभाओं में बड़ी संख्या में भाई-बहनों एवं श्रद्धालुओं ने पुष्पांजलि अर्पित कर मम्मा की शिक्षाओं को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लिया।
श्रद्धांजलि सभा को संबोधित करते हुए लश्कर ग्वालियर केंद्र प्रभारी राजयोगिनी बीके आदर्श दीदी ने कहा कि मातेश्वरी जी सदैव सजग, अनुशासित और सटीक निर्णय लेने वाली महान आत्मा थीं। उनकी विशेषता थी कि “बाबा का कहना और मम्मा का करना।” जीवन में कैसी भी परिस्थितियां आईं, उन्होंने सदैव गंभीरता, धैर्य और दृढ़ता के साथ उनका सामना किया तथा सभी के लिए आदर्श प्रस्तुत किया।
अमृतसर में हुआ था जन्म
मातेश्वरी जगदम्बा सरस्वती का जन्म वर्ष 1919 में अमृतसर के एक साधारण परिवार में हुआ था। उनका बचपन का नाम ओम राधे था। कहा जाता है कि जब वे ‘ओम’ का उच्चारण करती थीं तो वातावरण में गहन शांति का अनुभव होता था, इसलिए वे ओम राधे के नाम से विख्यात हुईं। बचपन से ही वे कुशाग्र बुद्धि, प्रतिभाशाली एवं आध्यात्मिक प्रवृत्ति की थीं। ब्रह्मा बाबा द्वारा सुनाई गई ज्ञान की बातों को वे एक बार में ही आत्मसात कर अपने जीवन में उतार लेती थीं। 24 जून 1965 को उन्होंने अपने नश्वर शरीर का त्याग कर संपूर्णता की अवस्था को प्राप्त किया।
1965 तक निभाई मुख्य प्रशासिका की जिम्मेदारी
बीके ज्योति बहन ने बताया कि वर्ष 1937 में प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय की स्थापना के समय संस्थापक ब्रह्मा बाबा ने माताओं एवं बहनों के नाम से एक ट्रस्ट का गठन किया था, जिसकी प्रथम जिम्मेदारी मातेश्वरी जगदम्बा सरस्वती (मम्मा) को सौंपी गई। उन्होंने 24 जून 1965 तक संस्थान की बागडोर अत्यंत कुशलता, दूरदर्शिता और समर्पण भाव से संभाली। कम आयु होने के बावजूद उनका गंभीर व्यक्तित्व, आध्यात्मिक ज्ञान की गहराई और नेतृत्व क्षमता सभी को आश्चर्यचकित कर देती थी। मम्मा के अव्यक्त होने के पश्चात ब्रह्मा बाबा ने राजयोगिनी दादी प्रकाशमणि को संस्थान की जिम्मेदारी सौंपी।
बीके प्रहलाद भाई एवं बीके डॉ. गुरचरन सिंह ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि मम्मा का जीवन त्याग, तपस्या, सेवा और आदर्श मूल्यों की जीवंत मिसाल था। उनका जीवन हमें सिखाता है कि यदि मनुष्य पवित्रता, विनम्रता, सहनशीलता तथा परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण को अपनाए, तो वह स्वयं के साथ-साथ सम्पूर्ण विश्व के कल्याण का माध्यम बन सकता है। उनका सम्पूर्ण जीवन ज्ञान, योग, धारणा और सेवा का अद्भुत संगम था।
कार्यक्रम के दौरान ग्वालियर के सभी सेवा केंद्रों पर सैकड़ों भाई-बहनों एवं श्रद्धालुओं की उपस्थिति रही।

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स्वामी विवेकानंद जी की जयंती के उपलक्ष्य में ब्रह्माकुमारीज केंद्र पर विशेष कार्यक्रम आयोजित

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हमें अपने कर्मों से समाज और राष्ट्र के लिए उदाहरण बनना चाहिए – बीके आदर्श दीदी

ग्वालियर। माधौगंज स्थित प्रभु उपहार भवन में स्वामी विवेकानंद जी की जयंती राष्ट्रीय युवा दिवस के उपलक्ष्य में प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय की सहयोगी संस्था राजयोग एजुकेशन एण्ड रिसर्च फाउंडेशन के युवा प्रभाग द्वारा एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

कार्यक्रम का उद्देश्य युवाओं में आत्मशक्ति, राष्ट्रभक्ति एवं सकारात्मक जीवन मूल्यों का संचार करना रहा।

कार्यक्रम में मुख्य रूप से ब्रह्माकुमारीज केंद्र प्रमुख बीके आदर्श दीदी, आनंद विभाग के संयोजक एवं समाजसेवी पवन दीक्षित, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ लश्कर के जिला प्रचारक रोहित जी, युवा समाजसेवी हर्षित शर्मा, सौरभ सिकरवार, युवा प्रभाग के राष्ट्रीय कार्यसमिति सदस्य एवं प्रेरक वक्ता बीके प्रहलाद भाई सहित अनेकानेक युवा भाई एवं बहनें उपस्थित थे।

कार्यक्रम में वक्ताओं ने भारतवर्ष की गौरवशाली परंपरा और युवाओं की भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला।

इस अवसर पर बीके आदर्श दीदी ने कहा कि अब समय आ गया है कि हम अपने भीतर छिपी हुई शक्तियों को पहचानें और उन्हें जाग्रत करें। परमात्मा ने किसी को भी कमजोर बनाकर नहीं भेजा है, आवश्यकता केवल अपनी सामर्थ्य पर विश्वास करने की है। उन्होंने कहा कि जीवन केवल जीने के लिए नहीं, बल्कि किसी ऊँचे उद्देश्य के लिए जिया जाना चाहिए। स्वामी विवेकानंद जी को आज इसलिए याद किया जाता है क्योंकि उन्होंने अपने विचारों और कर्मों से अपने जीवन को एक जीवंत संदेश बना दिया। हमें भी अपने कर्मों से समाज और राष्ट्र के लिए उदाहरण बनना चाहिए।

रोहित जी ने कहा कि हमारा देश भारतवर्ष, जिसे अखंड भारतवर्ष के नाम से भी जाना जाता है, केवल एक भू-भाग नहीं है, बल्कि त्याग, तपस्या और राष्ट्रभक्ति की जीवंत परंपरा का प्रतीक है। भारत का युवा अनेक भावनाओं के साथ आगे बढ़ता है, जिनमें सबसे पवित्र भाव देशभक्ति का है। स्वामी विवेकानंद जी ने भारत के युवाओं को जाग्रत करते हुए उन्हें अपनी आंतरिक शक्ति का बोध कराया।

पवन दीक्षित ने अपने उद्बोधन में कहा कि स्वामी विवेकानंद जी की जयंती आज पूरे भारतवर्ष में श्रद्धा के साथ मनाई जाती है। इसका कारण उनका त्याग, चरित्र, राष्ट्रप्रेम और युवाओं के प्रति समर्पण है। उन्होंने कहा कि जब वरिष्ठजन सत्य, अनुशासन और सेवा का आदर्श सामने रखेंगे, तभी युवा सही दिशा में आगे बढ़ेंगे।

कार्यक्रम का कुशल संचालन करते हुए बीके प्रहलाद भाई ने कहा कि “उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक मत रुको” का अमर संदेश स्वामी विवेकानंद जी ने दिया, जो आज भी युवाओं के लिए जीवन जीने की दिशा तय करता है। उन्होंने आगे बढ़ती हुई नशे की प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यह न केवल युवाओं के जीवन को, बल्कि समाज और राष्ट्र के भविष्य को भी कमजोर कर रही है। युवाओं को स्वामी विवेकानंद जी से प्रेरणा लेकर उनके विचारों को आत्मसात कर आत्मबल, अनुशासन, सेवा और राष्ट्रनिर्माण के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए।
इस अवसर ओर हर्षित शर्मा और सौरभ सिकरवार ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

कार्यक्रम के अंत में सभी ने पर्यावरण को अच्छा बनाये रखने के लिए सिंगल यूज़ प्लास्टिक को उपयोग न करने की शपथ भी ली।

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माधवगंज स्थित प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के प्रभु उपहार भवन में “सकारात्मक सोच से खुशनुमा जीवन” विषय पर एक कार्यक्रम का आयोजन हुआ।

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जीवन में वास्तविक मूल्य चीज़ों का नहीं, बल्कि हमारे व्यवहार, स्वभाव का है 

ग्वालियर। माधवगंज स्थित प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के प्रभु उपहार भवन में “सकारात्मक सोच से खुशनुमा जीवन” विषय पर एक कार्यक्रम का आयोजन हुआ।
कार्यक्रम में मुख्य रूप से केंद्र प्रमुख बीके आदर्श दीदी, भारतीय जनसंचार संस्थान के पूर्व महानिदेशक एवं माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर संजय द्विवेदी, आईटीएम विश्व विद्यालय के प्राध्यापक डॉ मनीष जैसल, प्रेरक वक्ता एवं राजयोग ध्यान प्रशिक्षक बीके प्रहलाद भाई उपस्थित थे।

कार्यक्रम में ब्रह्माकुमारी आदर्श दीदी ने अपने आशीर्वचन देते हुए कहा कि हमारे संस्कारों को दिव्य बनाने वाला सबसे श्रेष्ठ भोजन है, परमात्मा का नित्य सत्संग। जैसे शरीर को भोजन न मिले तो वह कमजोर होने लगता है, वैसे ही आत्मा को सत्संग न मिले तो वह थक जाती है, उलझ जाती है, और धीरे-धीरे जीवन में खालीपन महसूस होने लगता है। दीदी ने आगे कहा कि यदि हम कुछ समय ईश्वर की याद, सत्संग और आत्मचिंतन को नहीं देते, तो मन का शोर शांत नहीं होगा। मन को साधन, पैसा, प्रतिष्ठा नहीं चाहिए, उसे चाहिए परमात्म-शक्ति, प्रेम, स्थिरता और मार्गदर्शन। सच्ची खुशी और शांति तो प्रतिदिन ईश्वर की याद से ही आ सकती है।
आज हम सभी ने भौतिक सुख सुविधाओं के सभी साधन तो इक्कट्ठे कर लिए है, परन्तु शरीर के पास सब कुछ हो जाए, लेकिन मन खाली हो, तो जीवन में आनंद की अनुभूति नहीं हो सकती। इसके लिए चाहिए परमात्मा की याद। और परमात्म याद वह रोशनी है जो अंधेरों को तोड़ती है, टूटे मन को जोड़ती है, बिखरे विचारों को सँवारती है और व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाती है। जब मन परमात्मा की याद से जुड़ता है, तब जीवन में करुणा आती है, संस्कार दिव्य होते हैं, क्रोध मिटता है, और व्यक्ति हर परिस्थिति में स्थिर रहना सीखता है। दुनिया की भीड़ आपको थका देगी, लेकिन परमात्मा की याद आपको उठाएगी और आगे बढ़ाएगी।

प्रोफ़ेसर संजय द्विवेदी ने कहा कि यह एक ऐसी जगह है जहां से राजयोग का ज्ञान प्राप्त होता हैं राजयोग हमारी दुनिया को एक सुंदर दुनिया में बदलने का अभ्यास हैं हम सब चाहते हैं कि बेहतर दुनिया बने उसमें सब लोग सुख शांति और आनंद के साथ रहे उस आनंद की खोज में ही इस राजयोग का विकास हुआ है।

आईटीएम विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ मनीष जैसल ने कहा कि मेरे लिए तो सौभाग्य की बात है कि मुझे समय प्रति समय यहाँ आने का मौका मिलता है। इस कैंपस के अंदर आते ही एक अलग प्रकार की शांति की अनुभूति होती है दुनिया में सबसे अच्छी जगह यही है जहां पर बहुत कुछ प्राप्त कर सकते है और अपना परिवर्तन कर सकते है।

मोटिवेशनल स्पीकर बीके प्रहलाद भाई ने कह कि इंसान इस दुनिया में बहुत कुछ करता है। अपने सपने पूरे करता है, रिश्तों को निभाता है, अनुभव की लेन देन करता है, जीवन को सुंदर बनाने के प्रयास में रहता है। लेकिन हमारे पास जो जमा होता है वह है हमारे श्रेष्ठ कर्म, हमारे संस्कार और हमारी अच्छाई जो हमारे साथ भी जाती है। इसलिए जीवन में वास्तविक मूल्य चीज़ों का नहीं, बल्कि हमारे व्यवहार, हमारे स्वभाव और हमारे आंतरिक भावों का है। जीवन में सबसे बड़ा शत्रु क्रोध है। क्रोध इंसान की बुद्धि को खराब कर देता है, रिश्तों को तोड़ देता है और मन की शांति को छीन लेता है। क्रोध क्षणिक होता है, लेकिन उसका प्रभाव लंबे समय तक रहता है। आज दुनिया में जितनी मानसिक और शारीरिक बीमारियाँ बढ़ रही हैं, उनमें क्रोध, तनाव और आंतरिक बेचैनी सबसे बड़ा कारण बन चुके हैं। गुस्सा न केवल शब्दों को कड़वा बनाता है, बल्कि आत्मा को भी कमजोर कर देता है। आज मनुष्य बाहरी रूप से बहुत कुछ हांसिल कर रहा है। धन, साधन, तकनीक, सुविधाएँ लेकिन आंतरिक रूप से खाली हो रहा है। मन के अंदर शांति नहीं, संतुलन नहीं, स्थिरता नहीं। हम बाहरी दुनिया को जीतने में लगे हैं, लेकिन अपनी ही भीतरी दुनिया से हारते जा रहे हैं। यही कारण है कि मन थक जाता है। इस खालीपन से बाहर निकलने के लिए हमें अपने भीतर रोशनी जगानी होगी धैर्य की, प्रेम की, क्षमा की, और सबसे महत्वपूर्ण, आत्म-जागृति की। जब हम क्रोध को छोड़कर करुणा अपनाते हैं, जब हम शिकायत छोड़कर आभार अपनाते हैं, जब हम बाहरी दिखावे से हटकर अपने भीतर झाँकते हैं तभी जीवन में सच्चा संतोष आता है।
कार्यक्रम में अनेकानेक लोग उपस्थित थे।

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